वास्तु टिप्स

Horoscope, Janam Kundali, Business Problems, Health problems

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आज हम  बात करेंगे  कुछ लोगों को  क्यों अचानक  बिना किसी ठोस कारण मान इज्जत मे कमी और धन दौलत  घटना शुरू हो जाती है। इसका कारण  हमारी  कोई छोटी सी गलती भी हो सकती है ।जी हां  हम बात कर रहे हैं ।ईशान दिशा की ।उत्तर दिशा यानी ईशान दिशा। यह चारों दिशाओं में सबसे शुभ और पवित्र मानी जाती है। हमारी पृथिवी के  भूमंडल के हिसाब से ईशान कोण की तरफ से चुंबकीय तरंगें   उत्तर से दक्षिण की ओर चलती है। सारी पृथ्वी  इस चुंबकीय तरंगों के प्रभाव से प्रभावित है ।घर के जिस और भी उत्तर हो उस तरफ से यह चुंबकीय तरंगें घर में प्रवेश कर रही हैं । अगर हम ईशान दिशा की तरफ गंदगी कूड़े के ढेर और भारी सामान रखेंगे तो इसके अलग-अलग नुकसान होने शुरू हो जाएंगे ।

क्योंकि चुंबकीय तरंगों को  आपके घर के अंदर आने के लिए रुकावटें  पैदा होने शुरू हो गई है ।अगर कूड़े के ढेर ईशान दिशा की तरफ है तो मान सम्मान और इज्जत कम होनी शुरू हो जाएगी ।परिवार में सदस्य एक दूसरे का सम्मान कम करना शुरू कर  देगे। इस के साथ साथ समाज में भी मान-सम्मान कम होना शुरू हो जाएगा ।अगर ईशान की तरफ भारी सामान लोहा ईट पत्थर आमतौर पर घरों में फूल वाले गमले तक लोग ईशान दिशा में रख देते हैं । जो कि  ईशान कोण के  प्रभाव को  कम कर रहे हैं। ईशान कोण मे भारी भरकम ऊंचे ऊंचे  पिल्लर बनाने से ईशान दिशा को भारी करना आर्थिक स्थिति को कमजोर करेगा ।

कर्जा कम होने की जगह बढ़ता ही जाएगा । घर की भौगोलिक स्थिति मे ईशान दिशा में घर से ऊंचे पेड भी  नहीं लगाने चाहिए । भगवान  श्री  विश्वकर्मा जी के  मतानुसार  वास्तु देव का सिर  हमेशा ईशान दिशा में होता है। अगर हम  वस्तु देव के सर पर  गंदगी या किसी तरीके से भी ईशान दिशा को भद्दा करेंगे । तो वास्तु पुरुष उस घर से रुष्ट हो जाएगा। जिसका नुकसान  मान इज्जत और धन दौलत कम होने के शक्ल में पैदा होना शुरू हो जाएगा।

भगवान  विश्वकर्मा जी के  रचित  वास्तु  शिल्प  नामक  ग्रंथ में  इसका  उल्लेख है । धन दौलत मान सम्मान के लिए घर  के ईशान कोण को साफ और  रोशनी से  उज्जवल  रखना चाहिए । ता जो  आपके  घर  ऑफिस  और व्यापारिक संस्थान  में  धनात्मक  ऊर्जा का प्रवेश  निर्विघ्न  होता रहे।  और आप  सफलता  पूर्व  अपना जीवन  यापन करें।

राक्षस का वध करने के उपरांत भगवान शंकर के थकित शरीर के पसीने से उत्पन्न एक क्रूर भूखे सेवक की उत्पत्ति हुई जिसने अंधकराक्षस के शरीर से बहते हुए खून को पिया फिरभी उसकी क्षुधा शांत नहीं हुई। तब उसने शिवजी की तपस्या की और भगवान से त्रिलोकों को खा जाने का वर प्राप्त कर लिया। जब वह तीनों लोकों को अपने अधीनकर भूलोक को चबा डालने के लिए झपटा तो देवतागण,प्राणी सभी भयभीत हो गए। तब समस्त देवता ब्रह्मा जी के पास रक्षा सहायता हेतु पहुंचे। ब्रह्मा जी ने उन्हें अभयदान देते हुए उसे औंधेमुंह गिरा देने की आज्ञा दी और इस तरह शिव जी के पसीने से उत्पन्न वह क्रूर सेवक देवताओं के द्वारा पेट के बलगिरा दिया गया और उसे गिराने वाले ब्रह्मा, विष्णु, इंद्रआदि पैंतालीस देवता उसके विभिन्न अंगों पर बैठ गए। यही वास्तु-पुरुष कहलाया। देवताओं ने वास्तु पुरुष से कहा तुम जैसे भूमि पर पड़े हुए हो वैसे ही सदा पड़े रहना और तीन माह में केवल एक बारदिशा बदलना।

भादों, क्वार और कार्तिक में पूरब दिशा में सिर वपश्चिम में पैर, अगहन, पूस और माघ के महीनों में पश्चिम की ओरदृष्टि रखते हुए दक्षिण की ओर सिर और उत्तर की ओर पैर, फाल्गुन,चैत और बैसाख के महीनों में उत्तर की ओर दृष्टि रखते हुए पश्चिम मेंसिर और पूरब में पैर तथा ज्येष्ठ, आषाढ़ और सावन मासों में पूर्वकी ओर दृष्टि और उत्तर दिशा में सिर व दक्षिण में पैर। वास्तु पुरुषने देवताओं के बंधन में पड़े हुए उनसे पूछा कि मैं अपनी भूख कैसेमिटाऊं। तब देवताओं ने उससे कहा कि जो लोग तुम्हारे प्रतिकूलभूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण का कार्य करें उनलोगों का तुम भक्षण करना। तुम्हारी पूजन, शांति के हवनादि कबगैर शिलान्यास, गृह-निर्माण, गृह-प्रवेश आदि करनेवालों को और तुम्हारे अनुकूल कुआं तालाब, बाबड़ी, घर, मंदिरआदि का निर्माण न करने वालों को अपनी इच्छानुसार कष्ट देकर सदा पीड़ा पहुंचाते रहना। उपर्युक्त तथ्यों को देखते हुएकिसी भी प्रकार का निर्माण कार्य वास्तु के अनुरूपकरना चाहिए।

वास्तुशास्त्र एवं दिशा

उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम ये चार मूल दिशाएं हैं। वास्तु विज्ञान में इन चार दिशाओं के अलावा 4 विदिशाएं हैं। आकाश और पाताल को भी इसमें दिशा स्वरूप शामिल किया गया है। इस प्रकार चार दिशा, चार विदिशा और आकाश पाताल को जोड़कर इस विज्ञान में दिशाओं की संख्या कुल दस माना गया है। मूल दिशाओं के मध्य की दिशा ईशान, आग्नेय, नैऋत्य और वायव्य को विदिशा कहा गया है।

वास्तुशास्त्र में पूर्व दिशा

वास्तुशास्त्र में यह दिशा बहुत ही महत्वपूर्ण मानी गई है क्योंकि यह सूर्य के उदय होने की दिशा है। इस दिशा के स्वामी देवता इन्द्र हैं। भवन बनाते समय इस दिशा को सबसे अधिक खुला रखना चाहिए। यह सुख और समृद्धि कारक होता है। इस दिशा में वास्तुदोष होने पर घर भवन में रहने वाले लोग बीमार रहते हैं। परेशानी और चिन्ता बनी रहती हैं। उन्नति के मार्ग में भी बाधा आति है।

वास्तुशास्त्र में आग्नेय दिशा

पूर्व और दक्षिण के मध्य की दिशा को आग्नेश दिशा कहते हैं। अग्निदेव इस दिशा के स्वामी हैं। इस दिशा में वास्तुदोष होने पर घर का वातावरण अशांत और तनावपूर्ण रहता है। धन की हानि होती है। मानसिक परेशानी और चिन्ता बनी रहती है। यह दिशा शुभ होने पर भवन में रहने वाले उर्जावान और स्वास्थ रहते हैं। इस दिशा में रसोईघर का निर्माण वास्तु की दृष्टि से श्रेष्ठ होता है। अग्नि से सम्बन्धित सभी कार्य के लिए यह दिशा शुभ होता है।

वास्तुशास्त्र में दक्षिण दिशा

इस दिशा के स्वामी यम देव हैं। यह दिशा वास्तुशास्त्र में सुख और समृद्धि का प्रतीक होता है। इस दिशा को खाली नहीं रखना चाहिए। दक्षिण दिशा में वास्तु दोष होने पर मान सम्मान में कमी एवं रोजी रोजगार में परेशानी का सामना करना होता है। गृहस्वामी के निवास के लिए यह दिशा सर्वाधिक उपयुक्त होता है।

वास्तुशास्त्र में नैऋत्य दिशा

दक्षिण और पश्चिक के मध्य की दिशा को नैऋत्य दिशा कहते हैं। इस दिशा का वास्तुदोष दुर्घटना, रोग एवं मानसिक अशांति देता है। यह आचरण एवं व्यवहार को भी दूषित करता है। भवन निर्माण करते समय इस दिशा को भारी रखना चाहिए। इस दिशा का स्वामी राहूदेव है। यह दिशा वास्तु दोष से मुक्त होने पर भवन में रहने वाला व्यक्ति सेहतमंद रहता है एवं उसके मान सम्मान में भी वृद्धि होती है।

वास्तुशास्त्र में इशान दिशा

इशान दिशा के स्वमी शिव होते है, इस दिशा में कभी भी शोचालय कभी नहीं बनना चाहिये!नलकुप, कुआ आदि इस दिशा में बनाने से जल प्रचुर मात्रा में प्राप्त होत है

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